नई दिल्ली

संपत्ति खरीदने का सौदा करने के बाद मालिक रजिस्ट्री नहीं करे तब क्या है खरीददार के अधिकार

संपत्ति खरीदने का सौदा करने के बाद मालिक रजिस्ट्री नहीं करे तब क्या है खरीददार के अधिकार

संपत्ति खरीदने का सौदा करने के बाद मालिक रजिस्ट्री नहीं करे तब क्या है खरीददार के अधिकार

अजय चड्डा नई दिल्ली

आपराधिक कानून:-

जब भी किसी व्यक्ति द्वारा अपने मालिकाना हक की संपत्ति को बेचने का सौदा किसी क्रेता के साथ किया जाता है तब प्रतिफल की संपूर्ण राशि अदा कर देने के पश्चात विक्रेता का यह दायित्व बनता है कि वह क्रेता के पक्ष में रजिस्ट्री कर दे। कभी-कभी यह होता है कि विक्रेता द्वारा संपूर्ण धनराशि प्राप्त तो कर ली जाती है पर ऐसी धनराशि को प्राप्त करने के बाद रजिस्ट्री करने से इंकार कर दिया जाता है या फिर क्रेता को झूठे वादे करके फसाया जाता है।

भारतीय दंड संहिता 1860 के अंतर्गत इस परिस्थिति से निपटने हेतु संपूर्ण व्यवस्था दी गई है। अधिनियम की धारा 420 और 406 इस मामले में प्रयोज्य होती है।

–धारा 420:-

यह धारा किसी व्यक्ति के साथ छल किए जाने पर लागू होती है। यह प्रसिद्ध धारा है जो छल का प्रतिषेध करती है। इस धारा के अंतर्गत यदि किसी व्यक्ति द्वारा किसी व्यक्ति को छल और कपट के माध्यम से उसकी संपत्ति को हड़पा जाता है तब दंड की व्यवस्था की जाती है। शिकायतकर्ता जो ऐसे अपराध से पीड़ित होता है अपनी शिकायत को लेकर संबंधित क्षेत्र के थाना प्रभारी के पास जा सकता है और एक लिखित ज्ञापन देकर थाना प्रभारी को इस प्रकरण से अवगत करा सकता है।

संबंधित क्षेत्र थाना की पुलिस ऐसे व्यक्ति पर जिसके द्वारा छल किया गया है, एक विक्रय अनुबंध किया गया और उस विक्रय अनुबंध के बाद रजिस्ट्री नहीं की गई तब उस व्यक्ति पर धारा 420 के अंतर्गत एफआईआर दर्ज करके मामले की विवेचना करके न्यायालय में प्रस्तुत कर देती है। इस प्रकरण में व्यक्ति को लंबी जेल भी होती है तथा शीघ्र जमानत मिलना भी सरल नहीं होता है।

–धारा 406:-

भारतीय दंड संहिता की धारा 406 अमानत में खयानत से संबंधित है। इस धारा के अंतर्गत किसी व्यक्ति के साथ यदि छल के माध्यम से अमानत में खयानत की जाती है तब दंड का प्रावधान किया गया है। विक्रय का सौदा करना और उसके बाद रजिस्ट्री नहीं करना एक प्रकार से अमानत में खयानत है और ऐसी अमानत में खयानत छल के माध्यम से की जाती है।

–पुलिस सुनवाई नहीं करे तब:-

यदि पुलिस द्वारा इस प्रकरण में एफआईआर दर्ज नहीं की जाती है और आरोपी पर मुकदमा संस्थित नहीं किया जाता है तब पीड़ित पक्षकार न्यायालय में भी अपनी शिकायत प्रस्तुत कर सकता है तथा धारा 156(3) के अंतर्गत एक निजी परिवाद के माध्यम से मजिस्ट्रेट द्वारा पुलिस को प्रकरण दर्ज करने हेतु आदेशित करवा सकता है।

–विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम (धारा 10):-

विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम (Specific Relief Act) की धारा 10 किसी भी संविदा के पालन करवाए जाने के संबंध में उपबंध करती है। इस धारा के अंतर्गत पीड़ित पक्षकार न्यायालय के समक्ष उपस्थित होकर अपनी संविदा को पालन करवाए जाने हेतु निवेदन कर सकता है। इस धारा के अंतर्गत न्यायालय को संविदा का पालन करवाना ही होता है तथा उसे किसी प्रकार का विवेकाधिकार प्राप्त नहीं है

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